How is made corn starch? In Hindi। Method of making corn starch and complete industry information.

मक्का का स्टार्च बनाने की विधि एवं संपूर्ण उद्योग जानकारी 

                                 


हम खाद्य पदार्थों के रूप में फ़ल, सब्जियों, दालें और अनाज आदि खाते हैं । उन सभी मे प्रोटीन और स्टार्च नामक दो तत्व अनिवार्य रूप से होते हैं । जहाँ तक अरारोट और साबूदाने का प्रश्न है, ये शुद्ध स्टार्च हैँ और प्रकृति से हमें इसी रूप मे प्राप्त होते हैं । साबूदाने की तो फलियों होती हैँ और अरारोट एक विशेष पौधे की जड़ में उगने वाली गांठों को पीसकर तैयार किया जाता है । जहाँ तक अन्य अनाजों और सब्जियों मे स्टार्च की मात्रा और उनके भौतिक गुणों का प्रश्न है, उनमें पर्याप्त अन्तर होता है । यही कारण है कि व्यावहारिक रूप में केवल दो अनाजों ग्वार और मक्का के स्टार्च ही विशेष रूप से तैयार किए जाते हैँ । इनमें मक्का का स्टार्च बहुत ही पौष्टिक और सुपाच्य भोजन है और साथ ही अत्यन्त स्वादिष्ट भी। इसके ठीक विपरीत गत अध्याय में वर्णित ग्वार के स्टार्च की प्रमुख उपयोगिता इसकी लेही बनाकर कलफ के रूप में प्रयोग करना है । परन्तु जहाँ तक उत्पादन प्रक्रिया का प्रश्न है, ग्वार गम तैयार किया जाए अथवा मक्का का स्टार्च, इन दोनों के लिए समान मशीनों और उपकरणो का प्रयोग तो होता ही है, तैयार करने की प्रक्रिया भी पूरी तरह समान है । यहाँ तक कि एक ही प्लाण्ट पर इन दोनों का उत्पादन आसानी से किया जा सकता है ।

 मक्का के स्टार्च के उपयोग तथा बिक्री व्यवस्था

प्राचीनकाल से ही साबूदाने का प्रयोग मरीजों के पथ्य और विशिष्ट शक्ति-प्रदायक पोषक के रूप में होता रहा है क्योंकि यह शीघ्र सुपाच्य और शक्तिवर्द्धक होता है । परन्तु मक्का का स्टार्च तो इन गुणों में साबुदाने से भी बढकर है । यही कारण है कि अच्छी क्वालिटी के बिस्कुटों में तो मैदा और आटे के साथ बडी मात्रा में मक्का का स्टार्च मिलाया ही जाता है, कन्फेक्सनरी उद्योग में खटूटी-मीठी गोलियां आदि बनाते समय उन पर इसे सूखे पाउडर के रुप में पर्याप्त मात्रा में छिड़कते भी हैं। अनेक शक्ति-प्रदायक खाद्य पदार्थों के साथ-साथ देशी और अंग्रेजी दवाओं-के निर्माण में भी मक्का के स्टार्च का भरपूर मात्रा मे प्रयोग होता है । ग्लूकोज भी वास्तव में विशेष बिधि से परिष्कृत मक्का का स्टार्च ही है, डेक्सट्रीन भी-पानी में मक्का के स्टार्च को पकाते समय चन्द रसायन मिलाकर तैयार की जाती है।


ग्वार गम निर्माण के समान ही इस उद्योग मे भी आपको पैकिंग, प्रचार और बिक्री व्यवस्था पर लगभग कुछ भी व्यय नहीँ करना पडता । खाद्य पदार्थों और औषधि निर्माण उद्योगो में कच्चेमाल के रूप में प्रयोग किए जाने के कारण न तो प्रचार की अनिवार्य आवश्यकता है, और न ही शानदार पैकिंग की । पैकिंग मेँ सुन्दरता और मजबूती का तो कोई महत्व ही नहीं, परन्तु उसका नमी अवरोधी और एअरटाइट होना अनिवार्य है । यही कारण है कि इसे दो, पांच, दस और बीस किलोग्राम की मजबूत पोलीथीन की थैलियों में पैक किया जाता है । जहाँ तक बिकी व्यवस्था का प्रश्न हे बड़े बिस्कुट और कन्फेक्सक्शनरी निर्माताओं तथा आयुर्वेदिक एवं ऐलोपैथिक दवाएँ बनाने वालों को आप सीधे सप्लाई कर सकते हैँ । वेसे लगभग सभी बड़े रसायन विक्रेता भी इसे आपने यहाँ रखते ही हैँ ।


मक्के का चयन 

ग्वार गम उद्योग का एकमात्र कच्चामाल देशी ग्वार है, ठीक उसी प्रकार मक्का इस उद्योग का एकमात्र कच्चा माल है और गंधक का तेजाब अर्थात सल्फ्यूरिक एसिड सहायक रसायन। हाईब्रीड नस्ल की मक्का, जिसे अमरीकन मक्का भी कहा जाता है, में सबसे अधिक स्टार्च होता है और उसका छिलका भी अपेक्षाकृत कम समय में फूल जाता है । शंकर नस्लों की मक्का में भी पर्याप्त स्टार्च होता है, परन्तु देशी नस्ल की छोटे दानों वाली मक्का का प्रयोग करने पर कम अनुपात में स्टार्च तो मिलता ही है, इसका छिलका फूलने में भी अधिक समय लगता है । यहां बिशेष ध्यान रखने की बात यह है कि ग्वार गम तो देशी ग्वार में अधिक निकलता है, परन्तु मक्का का स्टार्च हाइंब्रीड अर्थात अमरीकन मक्का में अधिक होता है । पाँपकोर्न तथा कार्नफलेक्स निर्माण में भी इस हाईब्रीड मक्का का ही प्रयोग होता है और यही कारण है कि अब हमारे देश में मुख्य रूप से हाईब्रीड तथा मिश्रित नस्लों की मक्का ही अधिक उगाई जाती है । पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में इस मक्का की खेती बड़े पैमाने पर होती है, वैसे लगभग सम्पूर्ण भारत में ही उगाई जाती है ।


मशीने, उनकी सेटिंग तथा निर्माण प्रक्रिया 
 आठ उबले हुए अण्डे को छीलने पर चारों ओर एक मोटी परत के रूप में सफेद भाग होता है और उसके बीच में योलक नामक पीला भाग । ठीक यही स्थिति गेहूँ  ग्वार और मक्का आदि अनाजों की है । यदि आप इन्हें मध्य भाग से काटें तो ऊपर के मोटे मजबूत खोल के अन्दर आसानी से पाउडर बन जाने वाला एकदम दूधिया सफेद अंश होता है । छिलके के ठीक नीचे का यह कठोर भाग तो प्रोटीन और अन्य तत्वों का मिश्रण होता है तो मध्यवर्ती मुलायम भाग शुद्ध स्टार्च । यही कारण है कि इसके लिए मशीनों का चयन एकदम गत पोस्ट में वर्णित बिधि से ही आप करेंगे, बस टैंक बनवाने में ही थोड़ा अन्तर रखा जाएगा ।
रोलर मिल, पल्वीलाइज़र और ड्राइंग चेम्बर इस उद्योग की अनिवार्य आवश्यकताएँ हैं तो डिकी शिफ्टर और कार्ट सेपरेटर सहायक मशीनें । परन्तु इस प्रयोजन के लिए बनवाए जाने
वाले टैंकों में थोडा अन्तर होता है । ग्वार गम हेतु ग्वार का छिलका उतारने के लिए एक श्रृंखला तीन टैंक बनवाए जाते हें और वे पाइपों द्वारा एक दूसरे से संयुक्त भी होते हैँ । परन्तु मक्का को फुलाने और धोने का काम एक ही टैंक में किया जा सकता है । यही नहीं, मक्का का छिलका उतारने के लिए प्रयोग किया गया तेजाब मिश्रित पानी दोबारा प्रयुक्त नहीं होता, अत: मक्का धोते समय उसे भी बहा दिया जाता है । परन्तु इस टैंक में मक्का का छिलका फुलाने हेतु उसे एक से दो दिन तक रखना पडता है । यही कारण है कि व्यावहारिक रूप से आपकी कई टैंक तो बनवाने पड़ेगे, परन्तु वे एक दूसरे से जुडे हुए नहीं, पूर्ण रूप से स्वतन्त्र और अलग-अलग होंगे । दूसरा मुख्य अन्तर यह है कि इन टैंकों में प्लास्टिक अथवा रबर की लाइनिंग लगवाना भी अनिवार्य नहीं, क्योंकि पानी में दो से पाँच प्रतिशत तक गंधक का तेजाब मिलाकर ही प्रयोग किया जाता है ।


यूरेका तथा कार्टरडिस्क सेपरेटर्स

 प्रतिदिन कई टन मक्का के दानों का स्टार्च निकालते समय ही प्राय: इन दोनों सेपर्रेटरों, डिकी शिफ्टर तथा ब्लाकिंग मशीन का प्रयोग किया जाता है । मक्का को बोरों से निकालने के बाद यूरेका सेपरेटर द्वारा उसमें समाहित मिट्टी के कण एवं कंकर-पत्थर के टुकडे हटाए जाते हैं, तो कार्टर सेपरेटर द्वारा अन्य अनाजों के दाने अलग किये जाते हैँ । इन मशीनों का प्रयोग करने पर दो श्रमिक ही कई टन मक्का पूरी तरह साफ कर लेते हैँ । इस प्रकार श्रम, समय और स्थान में भारी बचत होती है । लगभग तीन लाख रुपए में ये दोनों मशीनें सेट हो जाती हैं।



डिकी शिफ्टर तथा ब्लाकिंग मशीन

ब्लाकिंग मशीन फर्श पर बिखरी हुई मक्का को ढेर के रूप में एकत्रित करने और उसे डिकी शिफ्टर के मुँह तक पहुंचाने वाला उपकरण है । ब्रेड के स्वचलित प्लाण्ट के फ्लोर शिफ्टर के समान ही डिकी शिफ्टर वायु के दबाव से इन मक्का के दानों को खींच-खींचकर और पूरी तरह सुखाकर पॉलिसिंग मशीन तक पहुँचाने का कार्य करता है । इन चारों मशीनों और इनके साथ लगाई जाने वाली कन्वेयर बेल्ट पर दस से पन्द्रह ताख रुपए तक की लगात आ जाती है । वैसे ये चारों अनिवार्य मशीनें नहीं । मवका को कई छलनों में छानकर और धूप में सुखाकर भी काम चलाया जा सकता है, परन्तु तब कई कर्मचारी और पर्याप्त स्थान अतिरिक्त रूप में चाहिए । वैसे यह जरूरी नहीं कि यूरेका तथा कार्टर डिस्क सेपरेटर के साथ ये दोनों मशीनें भी अनिवार्य रुप से ली जाएँ । सफाई का कार्य सेपरेटरों द्वारा और मक्का को टैंकों तक पहुंचाने का कार्य हाथों से आसानी से किया जा सकता है ।


मक्का को भिगोना व छिलका उतारना 

मक्का को भिगोए रखकर फुलाने के लिए किसी भी माप के और कितने भी टैंक बनवाए जा सकते हैँ । छोटे स्तर पर प्राय: दो सौ लीटर क्षमता के टैंक बनवाते हैं जिससे सामान्य पलटे से मक्का को उल्टा-पल्टा जा सके । टैंक की क्षमता की आधी मक्का डालने के बाद उसमे उतना ही गंधक का तेजाब मिश्रित पानी डालते हैँ । दो सौ लीटर के टैंक में एक कुंटल मक्का डालने के बाद एक सौ लीटर सल्फ्यूरिक एसिड मिश्रित ताजा पानी डाला जाता है । परन्तु ग्वार के , विपरीत मक्का में डाले जाने वाले पानी में तेजाब का अनुपात बहुत ही कम रखा जाता है। एक सौ लीटर पानी में केवल दो से पांच लीटर के मध्य गंधक के तेजाब को  मिलाकर इसे टैंक में डाला जाता है। पानी में दो प्रतिशत गंधक का तेजाब मिलाने पर छिलका फूलने में अड़तालीस घण्टे का समय लगता है, तो चार-पाँच प्रतिशत सल्फ्यूरिक एसिड मिलाने पर मात्र चौबीस घण्टे का समय । पाँच प्रतिशत से अधिक तेजाब तो कभी मिलाया ही नहीं जाता, वर्ना स्टार्च दूषित हो जाएगा । वेसे ग्रीष्मऋतु में दो प्रतिशत और सर्दियों में तीन प्रतिशत तेजाब मिलाकर दो दिन तक मक्का को टैंक में रखना सबसे अच्छा रहता हे । छिलका फूल जाने और मक्का का वसा तत्व अलग हो जाने के बाद टंकी की टोंटी खोलकर गंधक मिश्रित पानी को निकाल देते हैं और फिर पर्याप्त बहते हुए पानी में इस मक्का को बहुत ही अच्छी तरह से धोया जाता है । तेजाब मिश्रित पानी में पडी हुई मक्का को दस-पन्द्रह बार अच्छी तरह हिलाया-चलाया जाता हे, वर्ना तेजाब बहुत अधिक भारी होने के कारण तल में बैठ जाएगा और सभी दानों का छिलका समान रूप से नहीं फूल पाएगा ।

 सुखाना, पीसना व पैकिंग करना

 मक्का को एजीटेटर लगे हुए टैंक में ग्वार के समान धोकर भी साफ किया जा सकता है । वैसे इस कार्य के लिए ऐसी नालियों का प्रयोग अधिक पसन्द किया जाता है जिनमें साफ़ पानी निरन्तर बहता रहे । सभी छिलके हटाने के बाद इसे ड्राइंग चेम्बर में सुखाने, हैमर मिल अथवा रोलर मिल में दरदरा पीसकर बीजाणु -और एंडोस्पर्म अलग करने और एण्डोस्पर्म को पल्वीलाइज़र में पीसकर स्टार्च तैयार करने के सभी कार्य आगामी पोस्ट में वर्णित ग्वार गम के निर्माण के समान ही किए जाते हैँ । उसी प्रकार बीजाणु पशु-चारे के रूप में बिक जाता है, जो कि आपका सह उत्पाद है । वास्तव में आगामी पोस्ट में वर्णित ग्वार गम और मक्का के स्टार्च में एकमात्र अन्तर प्रयोग किए जाने वाले अनाज और तेजाब के अनुपात का है, प्लाण्ट और निर्माण प्रक्रिया तो समान ही है । इन दोनों उद्योगों में एक अन्य समानता यह भी है कि दाल-मिल और तेल-मिल के समान ही सीधे--सादे ये दोनों उद्योग, वास्तव में उद्योग से भी अधिक व्यवसाय हैं और व्यापार की तरह ही इन्हें चलाया जाता है ।






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