How is cornflakes formed? Complete process and industry knowledge of making cornflex in Hindi।

कॉर्नफ्लेक्स बनाने की संपूर्ण प्रक्रिया एवं उद्योग जानकारी


मैगी टाईप नूडल्स का फास्ट फूड के रुप में आगमन तो अस्सी के दशक में ही हुआ है, परन्तु मक्का के विशिष्ट विधि से निर्मित कॉर्नफ्लेक्सो का प्रयोग तो इस रूप में लगभग सौ वर्षों से हो रहा है । योरोप और अमरीका में तो लगभग प्रत्येक व्यक्ति नाश्ते के अनिवार्य उपादान के रुप में इनका प्रयोग करता ही है । हमारे देश में भी स्वास्थ्य के प्रति जागरूक और खुशहाल परिवारों द्वारा इनका प्रयोग दुध में भिगोकर नाश्ते के साथ किया जाता है । परन्तु नगरों और महानगरों में आधुनिक उच्च और मध्यम वर्ग तक ही सीमित है इनकी माँग । यही कारण है कि यह उद्योग प्रारम्भ करते समय काफी विस्तृत क्षेत्र में आपको बिक्री व्यवस्था सेट करनी होगी । वेसे न तो इस उद्योग में अधिक प्रतियोगिता है और न ही तैयार उत्पाद को अत्यन्त लाभप्रद दर पर बेचने में कोई परेशानी । समय के साथ-साथ जितनी तेजी से कार्नफ्लेक्स की माँग बढ़ रही है, उतनी तेजी से इसके नए कारखाने नहीं लग रहे । यही कारण है कि चालीस-पचास लाख रुपए तक पूंजी निवेश कर सकने वाले व्यक्तियों के लिए पूर्ण सुरक्षित, तीव्रतम गति से सतत विकासशील और पर्याप्त लाभदायक सिद्ध हो सकता है छोटे स्तर पर कार्नफ्लेक्स का निर्माण ।

मशीने, उपकरण तथा पूंजी निवेश

बहुत छोटे स्तर पर तो कॉंर्नफ्लेक्स का उत्पादन संभव ही नहीं, छोटी मशीनों और सामान्य उपकरणों का प्रयोग करने पर भी मशीनों व उपकरणों पर दस-पन्द्रह लाख रुपए लग ही जाते हैँ । इस रूप में आप एक-डेढ़ टन कॉंर्नफ्लेक्स प्रतिदिन तैयार कर सकते हैँ । यह महानगरिय सम्पन्न उपभोक्ताओं को बेचे जाने वाला खाद्य-पदार्थ है, अत: आधा और एक किलोग्राम के टिन के डिब्बे अथवा शानदार तीन सतह के पाउचों में रखकर ही इसे आप सप्लाई करने के लिए विवश हैँ । यद्यपि एक तथा दो या ढाई किलोग्राम पैकिंग में मोटी पोलोथीन की थैलियों में भी ये बिकते हैँ, परन्तु आधुनिक उच्च और उच्वमध्य वर्ग द्वारा प्रयोग किए जाने कै कारण शानदार पैकिंग में अधिक दर पर ये आसानी से बिक जाते हैँ । यही कारण है कि इस उद्योग में छोटे स्तर पर भी दो-तीन लाख रुपए जहाँ पैकिंग की मशीनों पर लग जाते हैँ, वहीँ प्रारम्भ में ही कई लाख रुपए पैकिंग मैटीरियल और प्रचार पर खर्च करने के लिए भी आप विवश हैं। स्वचलित प्लाण्ट में तो आगे ‘ मक्का का स्टार्च' पोस्ट में वर्णित यूरेका तथा कार्टर डिस्क सेपरेटर और ब्लाकिंग मशीन तथा डिकी शिफ्टर तथा बिस्कुट सेकने का छोटा ओवन लगाया जाता है । इनके साथ ही पोस्ट में वर्णित अन्य मशीने तो आप किसी भी स्तर पर उत्पादन करें, आपको लेनी ही होंगी । इस प्रकार छोटा प्लाण्ट जहां बीस-बाइस लाख रुपए में लग जाता है, वहीं स्वचलित प्लाण्ट लगाने पर लगभग साठ-सत्तर लाख रुपए मशीनों तथा कन्वेयर बेल्ट पर ही खर्च हो जाता है ।
किसी भी स्तर पर उत्पादन करने के लिए लगभग एक हजार वर्ग मीटर स्थान पर्याप्त रहता है । आटोमेटिक प्लाण्ट पर सभी कार्य एक श्रृंखला के रूप मेँ होता है और माल एक मशीन से दूसरी मशीन तक कन्वेयर बेल्ट द्वारा स्वयं जाता रहता है । अत: सामान्य प्लाण्ट की अपेक्षा तीन-चार गुना उत्पादन करने के बावजूद लगभग उतने ही कर्मचारी और स्थान पर्याप्त ऱहता है । वेसे इस उद्योग मैं जितना धन आपका सम्पूर्ण प्लाण्ट पर लगता है, उससे भी अधिक धन चाहिए कार्यकारी पूंजी अर्थात रनिंग कैपीटल के रूप में ।


मक्का तथा गुण वर्धक रचक

मक्का का स्टार्च तथा पॉपकॉर्न तैयार करने के समान ही हाइब्रिड नस्ल की मक्का के पूर्ण विकसित दानों से स्वादिष्ट, सुपाच्य और कुरकुरे कार्नफ्लेक्स तैयार होते हैं । छोटे दानों की देशी मक्का तो इस कार्य के लिए व्यर्थ है ही, संकर किस्म की मक्का से भी पूर्ण स्वादिष्ट कार्नफलेक्स तैयार नहीं हो पाते। स्वादवर्द्धन के लिए इनमें थोड़ा नमक और चीनी भी मिलाए जाते हैँ । नमक मक्का के भार का लगभग आधा प्रतिशत डाला जाता है तो चीनी दो से पांच प्रतिशत तक । इन्हें मनभावन सुगन्ध प्रदान करने के लिए अल्प मात्रा में वनीला की सुगन्ध का आधार रचक वेनीलोन भी डालना आवश्यक है । बेनीलोन के साथ नागनेडिया और स्टेटिक जैसे गंध दमनकारी रसायनों का प्रयोग करने पर मक्का की गंध पूरी तरह दब जाती है । वैसे प्रति टन मक्का चन्द ग्राम ही मिलाए जाते हैँ ये सुगन्धों के कीमती आधार रचक । नमक, चीनी तथा अन्य जो भी गुणवर्द्धक और गंध शमनकारी रचक एवं रसायन इनमे मिलाए जाते हैं, वे सभी उबले हुए पानी-में मिलाकर रोटरी कूकर में ही डाल दिए जाते हैँ, अत: न तो इन्हें मिलाने के लिए कोई उपकरण चाहिए और न ही इसके लिए कोई अतिरिक्त प्रयास ही करना पडता है । कुल लागत मूल्य का एकाध प्रतिशत भी इन राचकों पर व्यय नही होता, जो भी लागत आती है वह मक्का की खरीद पर ही आती है, या फिर पैकिंग पर ।


चरणबद्ध उत्पादन प्रक्रिया 

सबसे पहले मक्का को बहुत ही अच्छी प्रकार साफ किया जाता है । मिट्टी अथवा तिनकों की तो बात ही क्या, किसी अन्य अनाज के दाने भी इस मक्का में नहीं रहने चाहिए । मिट्टी हटाने के लिए यूरेका सेपरेटर तथा कंकड हटाने के लिए कार्टर डिस्क सेपरेटर का प्रयोग करने पर भी इस मक्का पर एक नज़र डालनी ही पडती है, जिससे अन्य किसी अनाज के दाने या तिनके इसमें न रह जाएँ । फर्श पर फैली इस मक्का को ब्लाकिग मशीन स्वयं इकटूठा करके डिकी शिफ्टर के मुँह तक पहुंचाती रहती है । ब्रेड के स्वचलित प्लाण्ट के फ्लोर शिफ्टर के समान ही डिकी शिफ्टर वायु के दबाव से मक्का के दानों को खीचकर और पूरी तरह सुखाकर क़न्वेयर बेल्ट पर अथवा हाथ से खीची जाने वाली गाडियों में डालता रहता है । वैसे मध्यम स्तर तक पर यह कार्य बड़े-बड़े छलनों द्वारा कर लिया जाता है और तीव्र हवा देने वाले बिजली के पंखों के आगे धार से डालकर किया जाता है । परन्तु आगामी सभी मशीने तो आप को चाहिए ही यद्यपि उनका आकार कुछ भी हो सकता है ।


पॉलिश मशीन पर छिलका उतारना

ग्वार गम और मक्का का स्टार्च बनाते समय तो ग्वार और मक्का को तेजाब के घोल में फुलाने के बाद छिलका उतारा जाता है । परन्तु इस कार्य को कार्नफ्लेक्स तैयार करते समय सूखे रुप में ही किया जाता है । यही कारण है कि पॉलिश मशीन इस उद्योग की एक अनिवार्य मशीन है, जो मक्का के दानों से छिलका उतारकर उन्हें चमकीला बनाने का कार्य करती है । इस मशीन में एक पात्र के अन्दर कई रोलर लगे होते हैँ जो एक दूसरे से पर्याप्त दूर होने के बावजूद घूमते अत्यन्त तीव्रगति से हैँ । मशीन में मक्का भरने के ऊपर लगे पात्र में मक्का भरकर मशीन चालू कर दी जाती है । तब ये रोलर तीव्रगति से घूमने लगते हैँ और इनके ऊपर थोडी-थोडी गिरती रहती है । ये रोलर्स खुरदरे नहीं, एकदम चिकने होते हैँ अत: सम्पर्क में आने वाले मक्का के दानों का ऊपरी पतला छिलका तो रगड से उतर ही जाता है, दाने अधिक चिकने और चमकीले भी हो जाते हैँ । मशीन में ऐसी व्यवस्था होती है कि दाने तो छिलने के बाद नीचे गिरते रहते हें और छिलके भूसी  के रूप में अलग एकत्रित होते रहते हैँ । यह छिलके पशु-पालक और मुर्गी-दाना तैयार करने वाले तो खरीद ही लेते हैँ, अधिक मात्रा मे होने पर कागज मिलों को अपेक्षाकृत अधिक दर पर आसानी से सप्लाई किए जा सकते हैँ ।


 पल्वीलाइजर में दानों को तोड़ना

स्टार्च तैयार करने के समान मक्का को दरदरा नहीं पीसा, जाता बल्कि प्रत्येक दाने को चार-पाँच टुकडों में तोड़ा जाता है। इस कार्य के लिए किसी सामान्य चक्की, ग्राइण्डर अथवा पलविलाइजर का उपयोग नहीं किया जा सकता । सामान्य पल्वीलाईजर तो मक्का का मैदा जैसा बारीक पाउडर ही बना देगा, जबकि रोलर मिल में बारीक टुकडे हो जाएंगे । यही कारण है कि सुपारी तोडने के बीटल नट डिवाइडर के समान ही मक्का के दानों को चार-चार टुकडों में तोडने के लिए मेज पल्वीलाइजर नामक विशिष्ट उपकरण का प्रयोग किया जाता है । प्राय: ही आर्डर देकर अपनी आवश्यकता के अनुरूप यह विशिष्ट पल्वीलाइजर बनवाना पडता है । इस पल्वीलाइजर में भी मक्का का स्टार्च तत्व फाइन पाउडर बन जाता है, परन्तु उसे छानकर अलग नहीं किया जाता ।


रोटरी कुकर में पकाना

मक्का के इन टुकडों को स्टार्च सहित रोटरी कुकर में डालकर मुलायम होने तक पकाया जाता है । परन्तु इन्हें गर्म पानी में सीधा आग पर नहीं उबाला जाता बल्कि रोटरी कुकर नामक
स्टील की मोटी चादरों से बनी मज़बूत टंकी मे भरकर इनके मध्य लगातार दो घण्टे तक वाष्प प्रवाहित की जाती है । पानी को उबालकर वाष्प का रूप देने और उसे अत्यधिक दबाव के साथ इन दानों मे गुजारने के लिए एक पर्याप्त बड़े स्टीम बायलर का प्रयोग किया जाता है । रोटरी कुकर के माप और क्षमता के अनुरूप ही होता है बायलर का भाप और वाष्प प्रवाहित करने की दबाव क्षमता । रोटरी कुकर के अन्दर नलों में लगने वाले आधा और एक इंच के पाइपों का एक जाल सा बिछाया जाता है । इन पाइपों मे अनेक छोटे-छोटे छिद्र होते हैँ, जिनसे निकलकर वाष्प इसमें भरे दानों के मध्य प्रवाहित होकर इन्हें पकाती और फुलाती रहती है ।
रोटरी कुकर आधा, एक अथवा दो टन किसी भी क्षमता का बनवाया जा सकता है । मक्का के ये दुकड़े इस टैंक में काफी फूलते हैँ अत: क्षमता से आधा ही भरा जाता है । दो टन क्षमता के रोटरी कुकर में एक टन मक्का के टुकडे डालने के बाद उनके ऊपर पौने दो सौ लीटर उबलता हुआ पानी डाला जाता है । स्वादवर्द्धन हेतु थोडा नमक और चीनी तथा मक्का की गंध दबाने हेतु गंध दमनकारी रसायन तथा स्वल्प मात्रा में वनीला पाउडर अथवा वनीला की सुगन्ध भी इन दानों में मिलाई जाती है । ये सभी वस्तुएँ तथा अन्य जो भी गुण एवं स्वादवर्द्धक रचक मिलाने होते हैँ, उन सभी को इस उबले हुए पानी में पहले ही घोल लेते हैं और फिर इस खौलते हुए जल को टैंक में डालते हैँ । इसके पश्चात लगातार दो घण्टे तक मक्का के इन टुकडों में रुकरुककर वाष्प प्रवाहित की जाती है । हमारा उद्देश्य मक्का को पकाना नहीं, बल्कि फुलाना और मात्र मुलायम करना होता है । इस प्रक्रिया में मक्का के दुकड़े फूलकर अपने वास्तविक आकार से लगभग दोगुने बड़े हो जाते हैं और तेंतीस प्रतिशत के लगभग इनका भार बढ जाता है, क्योंकि ये अपने भार का एक तिहाई जल सोख चुके होते हैं।

टंकियों में रखना तथा सुखाना

रोटरी कुकर से मक्का के टुकड़े निकालने के बाद सभी क्रियाएँ एक के बाद एक लगातार की जाती हैं, इन्हें बीच में रोका नहीं जा सकता । सबसे पहले इन गर्म और फूले हुए टुकडों को थोड़ा-थोड़ा कई छलनों में डाला जाता है । आंफसेट प्रिंटिंग प्रेस की ग्रेनिंग मशीन के समान ये छलने झटके से आगे-पीछे और दाएँ-बाएँ होते रहते हैँ । थोड़े-थोड़े अनेक छलनों में डाले जाते हैं ये दाने और दस-पन्द्रह मिनिट तक हिलाए जाते हैँ । इस प्रक्रिया मेँ इन दानों का फालतू पानी निकल जाता है । ये बडी सीमा तक ठण्डे हो जाते हैँ और साथ ही एक दूसरे से अलग-अलग भी । परन्तु अभी तक ये सभी टुकडे समान रूप से ठण्डे नहीं हो पाते और इनकी ऊपरी सतह की अपेक्षा मध्य भाग अधिक गर्म और नमी युक्त भी रहता है । अत: इन टुकड़ों को बहुत बड़े आकार के स्टील के ड्रमों में भरकर दो से चार घण्टों के लिए रख दिया जाता है, जिससे सभी टुकड़ों के सभी भागों में नमी की मात्रा और उनका तापमान समान हो जाए ।
टैंकों से निकालने के बाद इन टुकडों को हवा नहीं लगने दी जाती, बल्कि आलू के वेफर्स के समान ही सेंका जाता है । इस कार्य के लिए बिस्कुट बनाने के आंटोमेटिक प्लाण्ट में प्रयोग किए जाने वाले रोटरी ओवन से मिलते-जुलते ओवन का प्रयोग किया जाता है । परन्तु वेफ़र्स के ओवन के समान काफी छोटा तो यह ओवन होता ही है, इसमें ठण्डा करने वाला भाग और हीटर्स भी नहीं होते । इन्हें गर्म वायु प्रवाहित करके सेंका जाता है, परन्तु तकनीकी भाषा में इस प्रक्रिया को सेंकना या पकाना नहीं सुखाना कहा जाता है । इन्हें मात्र इतनी गर्मी प्रदान की जाती है कि ओवन से निकलते समय भी इनमें नमी की मात्रा छह से सात प्रतिशत रह ही जाए । यदि ये दुकड़े पूर्णतय: नमी रहित हो जाएंगे तो फ्लेक्स बनाते समय इनका बूरा हो जाएगा औरे इसीलिए इनमें यह नमी छोडी जाती है ।


सीजनिंग तथा फ्लेक्स का रूप देना

ओवन में गर्म हवा मक्का के दानों की नमी को पच्चीस प्रतिशत से घटाकर छह-सात प्रतिशत तक कर देती है, परन्तु इनकी ऊपरी सतह तो लगभग सूख जाती है और मध्यवर्ती भाग में अधिक नमी होती है । सभी टुकडों. को अन्दर से बाहर तक समान रूप से नमीयुक्त बनाने के लिए इन्हें एअरटाइट ड्रमों में तीन-चार घण्टे तक रखा जाता है । दानों को रोटरी ओवन से निकालकर सीजनिंग टैंकों में रखा जाता है और इन टंकियों को टेम्परिंग टैंक में । परन्तु वास्तव मैं यह नाम का ही अन्तर है, इन दोनों टैंकों में कोई अन्तर नहीं होता, दोनों ही स्टील की चद्दर की बनी एअरटाइट ढक्कन युक्त सामान्य टंकियाँ होती हैँ ।

कार्नफ्लेक्स पतली पपड़ियों के रूप मेँ होते हैँ और ये दाने अभी तक लगभग चौकोर तथा अनगढ़ होते हैं । इन्हे यह आकृति प्रदान करने के लिए फ्लेकिंग मंशीन नामक एक अत्यंत सामान्य जुगाड के रोलरों के मध्य से गुजारा जाता है । एक चौकोर टंकी के रूप में यह मशीन होती है और इसके तल में लगभग सटी हुई अवस्था के दो-दो रोलर्स के कई सेट लगे होते हैँ । परस्पर एक दूसरे की विरोधी दिशा में ये रोलर्स समान गति पर घूमते रहते हैं ।

मशीन में दानों के दुकड़े भर कर जब मशीन चालू कर दी जाती है तो घूमते हुए रोलरों के सम्पर्क में आने वाला प्रत्येक दुकड़ा दो रोलरों के मध्य से गुजरता है और इस प्रकार चपटा होकर कार्नफ्लेक्सो'का रूप धारण करके नीचे गिरता है । आकृति मेँ तो पॉलिश मशीन जैसी ही होती है यह फलेकिंग मशीन, परन्तु इसमें दूर-दूर कई रोलर नहीं, बल्कि एक दूसरे से सटे हुए दो-दो रोलरों के कई सेट लगे होते हैं । दूसरा मुख्य अन्तर यह है कि पॉलिश मशीन के टैंक में भरा हुआ थोड़ा-थोड़ा मक्का इसके रोलरों पर गिरता है, जबकि फ़्लेकिंग मशीन में रोलरों से ठीक ऊपर ही टैंक में पर्याप्त दाने भर दिए जाते हैं ।


पैकिंग तथा बिक्री व्यवस्था

कार्नफ्लेक्स रेडीमेड या रेडी-टू-यूज फूड नहीं, नूडल्स के समान फास्ट फूड है । उपभोक्ता इन्हें सीलबन्द रूप मेँ दुकानों से खरीदते हैँ । यही कारण है कि पहले तो इन्हें टिन के डिब्बे में ही पैक किया जाता था । इन डिब्बों में ढक्कंन तथा उसके नीचे पतली चद्दर की सील तो लगी हुई होती है, परन्तु तला खुला हुआ । नीचे से निश्चित भार मेँ कॉर्नफ्लेक्स भरकर इनका तला जड़ दिया जाता है । तीन सतह वाले पाउचों मेँ इन्हें पाउच भरने और पैक करने की आटोमेटिक मशीनों द्वारा ही भरा जाता है, तो सामान्य पोलीथीन की बडी थैलियों में इन्हें तोलकर भरने के बाद दो-ढाई सौ रुपए के सामान्य सीलर द्वारा भी एअर टाइट सील किया जा सकता है, परन्तु उसमें बहुत अधिक श्रम और समय लगेगा ।
 कार्नफ्लेक्स का प्रयोग प्रमुख रूप से नगरों में रहने वाले आर्थिक रूप से खुशहाल परिवारों द्वारा किया जाता है, अत: किसी भी स्तर पर उत्पादन करते समय कई नगरों में आपकी अपने अधिकृत प्रतिनिधि और थोक विक्रेता नियुक्त करने ही होंगे । सभी दुकानदारों द्वारा नहीं, पॉश कॉलोनियों के -गृह उपयोगी वस्तु भण्डारों, कैमिस्टों और सहकारी भण्डारों तथा विभागीय कैण्टीनों द्वारा ही यह प्राय: बेचा जाता है, अत: पढे-लिखे सेल्समैन रखना भी इस उद्योग की अनिवार्य आवश्यक्ता है । इसी प्रकार टेलीविजन, रेडियो अथवा समाचार पत्रों में प्रचार भी इस उद्योग में लाभकारी सिद्ध नहीं हो पाता । प्रचार के लिए आप पूरे परिवार द्वारा पढी जाने वाली, महिलाओं की विशिष्ट और स्वास्थ्य सम्बन्धी पत्रिकाओं में विज्ञापन दे सकते हैं । वेसे इस उद्योग मे प्रचार का सबसे अच्छा और सस्ता माध्यम है उन दुकानों पर स्टीकर, बोर्ड ,और हैंगर्स लगाना जो आपका माल बेचते हैँ । वैसे फास्ट फूड के इस युग में निरन्तर बढती ही जा रही है इनकी मांग, अत: बिना प्रचार के ही भरपूर मात्रा मेँ लाभ प्रदायक दरों पर आसानी से बिक जाते हैँ ।



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