How are made pill, toffee and lollipop made? In Hindi। Gol Toffee and Lollipop preparation method and complete information.

गोली, टॉफी व लॉलीपॉप बनाने की विधि एवं संपूर्ण जानकारी


विभिन्न प्रकार की रंग-बिरंगी खट्टी मीठी गोलियां , सामान्य कठोर टॉफियाँ, लॉलीपॉप, कांमफिट, ड्रेजीज, कन्जर्ब, बोनबोन्स, ट्रेकोडरोज आदि कन्फेकनरी आइटम्स का निर्माण कम पूंजी का, परन्तु अत्यन्त लाभप्रद एक ऐसा उद्योग है जिसमें विकास की असीम संभावनाएँ निहित हैं । चन्द हजार से लेकर कुछ लाखों रुपए तक के निवेश से इसे कस्बों से महानगरों तक कहीँ भी सफ़लतापूर्वक संचालित किया जा सकता है । मोके की दुकान या फैक्ट्री शेड तो क्या, विशिष्ट भवन और बिजली तक की अनिवार्य आवश्यकता इस उद्योग में नहीं । अनेक व्यक्ति तो घर पर ही इन वस्तुओं का निर्माण करके अच्छा-खासा स्वरोजगार अर्जित कर रहे हैँ, जबकि पचास वर्ग मीटर स्थान में दस से तीस हजार रुपए तक की मशीने और उपकरण तथा पचास हजाए रुपए से तीन-चार लाख रुपए तक कार्यकारी पूंजी के रूप मेँ लगा देने पर तो अच्छी खासी फैक्ट्री लग जाती है । पच्चीस से शत'-प्रतिशत तक शुद्ध लाभ अर्जित करना इस उद्योग में सहज सम्भव है, जबकि पार्ले, मार्टिन और केडबरीज जैसे बड़े निर्माताओँ के ये उत्पाद तो लागत मूल्य से चार-पांच गुना तक दर पर बिकते हैँ।

उद्योग का क्षेत्र 


इतना विस्तृत है  कनफेक्शनरी आइटम का यह रंग'-बिरंगा संसार कि सभी प्रकार की इन अग्रेजी मिठाइयों का निर्माण तो कोई बड़े से बड़ा निर्माता भी नहीं करता । कम-से-कम बीस उपवर्ग हैँ, विभिन्न दरों पर भरपूर मात्रा में बिकने वाली इन मिठाइयों के, और प्रत्येक उपवर्ग में इन्हें दर्जनों रंगों, सुगन्धों और आकारों में तैयार किया जाता है। इतने अधिक विविधतापूर्ण रंग-रूप और अनेक स्वाद एवं सुगन्ध होने के बावजूद इन सभी का मुख्य आधार रचक तो सामान्य चीनी है ही, सहायक एवं गुणवर्द्धक रचकौं तथा निर्माण प्रक्रियाओं में भी अधिक अन्तर नहीं । यही कारण है कि ग्रामीण अंचल अथवा छोटे कस्बे से लेकर महानगर तक किसी भी स्तर पर स्थानीय बाजार की मांग के अनुरूप इन मिठाइयों का निर्माण आसानी से किया जा सकता है । निरन्तर बढती हुई मांग और आसान परिवहन ने इसे एक ऐसे उद्योग का रूप दे दिया है
जिसमेँ उत्तम गुणवत्ता और लुभावने पैकिंग के बल पर आप प्रति वर्ष दोगुने तक की गति से बिकास आसानी से कर सकते हैं ।


खट्टी-मीठी रंगीन गोलियों अर्थात, ड्राप्स कैण्डीज नामक छोटी गोल और रेशम जैसी चमकदार गोलियों और चाशनी में पर्याप्त मात्रा में भर्ती के रचक डालकर बनाए गए खिलोनो की आकृति वाले केन्जर्ब सबसे अधिक बिकने वाली मिठाइयाँ है । चीनी की गाढी चाशनी मे रंग और नाम-मात्र की सुगन्ध मिला कर ये सभी मिठाइयां तैयार की जाती है । प्लास्टिक के पतले पाइप का टुकडा या सामान्य सींक लगाकर इन्हें लॉलीपॉप का रूप दिया जाता है, तो चाशनी मे प्रयाप्त मात्रा में दूध का सूखा पाउडर मिलाकर इन्हें टॉफी का नाम दिया जाता है । सबसे बडी बात तो यह है कि इन सभी को तैयार करने के लिए कोई मशीन या विशिष्ट उपकरण भी नहीं चाहिए ।  गाढी-चाशनी में रंग और सुगन्ध मिलाने के बाद हाथ से दबाए जाने वाले सांचों द्वारा भी इन्हे आसानी से तैयार किया जा सकता है । आकार के अनुरूप पॉच से बीस हजार रुपए के मध्य आने वाली यह रोलर मशीन लेने पर तो आप इनका निर्माण पर्याप्त बडे स्तर पर कर सकते हैं

मशीनों व उपकरणों का चयन 


आप किसी भी स्तर पर कोई भी कनफेक्शनरी आइटम तैयार करें भरपूर आग देने वाली पत्थर के कोयले अथवा गैस की कुछ भट्रिटयों और बहुत भारी तल की लोहे की कड़ाही तो अनिवार्य रूप से चाहिए । बहुत बड़े स्तर पर उत्पादन करते समय भी एक बार में अधिक मात्रा में चीनी नहीं पकाई जाती। चाशनी काफी गाढी तो तैयार की ही जाती है, कड़ाही में ही ठण्डा करने पर वह पिण्ड के रूप मे जम भी जाती हे । कम-से-कम बीस लीटर क्षमता की कड़ाही में ढाई लीटर पानी और दस किलोग्राम चीनी डालकर घूलने तक निरन्तर चलात्ते रहते हैं । चाशनी साफ करने के बाद इसमें पानी में घोलकर सीट्रिक एसिड डाला जाता है । तीन सौ दस से तीन सौ बीस फारेनहाइट तापमान पर निरन्तर चलाते हुए इसे गोली से भी सख्त चाशनी के रूप मे पकाकर मेज पर पलटा जाता है । चाशनी जल्दी…से-ज़ल्दी ठण्डी हो जाए, इसके लिए मेज पर नल के पाइपों के दुकड़े एक जाल के रूपमें रखे जाते हैं। एकदम गाढी चाशनी जब सबसे ऊपर वाले पाइप पर डाली जाती है, तब वह धीरे-धीरे अन्य पाइपों से होती हुईं नीचे आती है और इस रूप में पर्याप्त ठण्डी हो जाती है । थोडी गर्म अवस्था में ही हलवे की तरह गाढी इस चाशनी के पिण्ड बनाकर पन्नी आदि से ढककर रख लेते हैं जिससे वे जमें नही।
सभी प्रकार की गोलियों के लिए चाशनी एक ही बिधि से तैयार की जाती है । रंगहीन और सुगन्थ से रहित होते हैं चाशनी के ये पिण्ड । जैसा कि आप जानते हैं पकती हुईं या अधिक गर्म चाशनी में रंग मिलाने पर वह ताप के प्रभाव से बदरंग हो जाएगा और सुगन्ध तो उड़ ही जाएगी । यही कारण है कि कारीगर एक-एक पिण्ड लेकर और उसमें रंग तथा सुगन्ध मिलाकर आगे आकृति देने का काम करता है। रोलर मशीन का प्रयोग करने पर पहले तो रंग एवं सुगन्ध मिले पिण्ड को निश्चित मोटाई की चौरस शीट के रूप मैं बेला जाता है और इसके एकदम ठण्डा तथा कडा हो जाने पर रोलर मशीन पर विभिन्न आकृति की गोलियाँ काट ली जाती हैं। इसके विपरीत छोटे स्तर पर उत्पादन करते समय लकड़ी के बने पंचों का प्रयोग किया जाता है । इस रूप में कार्य करते समय रंग ओंर सुगन्थ मिले चाशनी के पिण्ड को बेलने के बाद पहले उसकी छोटी-छोटी बर्फियां काट ली जाती हैं और फिर एक-एक बर्फी पंच के आधार में खुदी आकृति में रखकर इसके कबर को दबाकर उन्हें आकृति दी जाती है। विभिन्न आकृतियों के तो ये पंच बनवाए ही जा सकते है, सींक के लिए रिक्त स्थान रखने पर लॉलीपॉप का निर्माण भी इन पर किया जा सकता है।
एकाध कुंटल ड्रॉप्स  और लॉलीपॉप तो प्रतिदिन उपरोक्त जुगाडों पर ही तैयार कर ली जाती हैं । बहुत बड़े स्तर पर उत्पादन करते समय भी बिजली से चलने वाली ऐसी रोलर मशीनें ले ली जाती हैं जिनमें एक ही आकृति खुदी होती है । दुग्ध पाउडर मिलाकर बनाई जाने वाली कठोर टॉफियां भी इन्हीं मशीनों पर बनाई जाती हैं । परन्तु लकडी अथवा प्लास्टिक की डण्डी लगी होने के कारण लॉलीपॉप रोलर मशीनों पर नहीं बनाए जा सकते । इन्हें या तो हाथ के दबाव से काम करने वाले पंचों पर तैयार किया जाता है या फिर चित्र में प्रदर्शित विशिष्ट मशीन पर । प्रतिघष्टा एक हजार से भी अधिक. लॉलीपॉप अथवा ड्रॉप्स तैयार करने वाली इस मशीन का प्रयोग करने पर रंग और सुगन्ध मिले पिण्ड को बेलना भी नहीं पडता । मशीन के विशिष्ट पात्र में चाशनी का पिण्ड रख दिया जाता है और वहाँ से वांछित मात्रा में स्वयं कट कट कर डाई ने जाता रहता है और तैयार लांलीपॉप निश्चित स्थान पर एकत्रित होते रहते हैं । जहां तक चीनी चढी हुई सौंफ 'अर्थात कमफिट्स का प्रश्न है, सौंफ अथवा अन्य किन्हीं भी बीजों पर चाशनी की परत के लिए कोटिंग पान नामक मशीन का प्रयोग किया जाता है ।
आप गोलियां रोलर मशीन पर बनाएँ या पंच द्वारा अथवा अन्य किसी भी मशीन पर, तैयार गोलियों को स्टार्च के ढेर में डालना और इन पर पर्याप्त स्टार्च का छिडकाव करते रहना आवशयक है वर्ना वे आपस में चिपक जाएंगी । इन गोलियों को पंखे की हवा में कुछ घण्टे पड़ा रहने देते हैं जिससे वे भली प्रकार सूख जाएँ । अच्छी प्रकार सूखी हुई गोलियों को काफी बड़े छेदों वाले छलने में डालकर छान लिया जाता हे, जिससे फालतू स्टार्च और टूटी हुई गोलियाँ अलग निकल जाएँ । कपड़े अथवा बुश से फालतू स्टार्च झाडने के बाद ये गोलियां बाजार भेजने के लिए तैयार हो जाती हैं । इस कार्य के लिए मक्के का स्टार्च सर्वश्रेष्ठ रहता है । मक्का का स्टार्च प्रयोग करने पर इनका स्वाद और पौष्टिक गुण दोनों ही काफी बढ़ जाते हैँ । इसके स्थान पर अरारोट अथवा आलू के स्टार्च का प्रयोग कुछ सस्ता पडता है और वह स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद भी नहीँ । परन्तु यह इस उद्योग का दुर्भाग्य ही है कि अनेक छोटे और गुमनाम निर्माता इस कार्य के लिए बारीक पिसी सेलम तक का प्रयोग कर लेते हैँ जो खाने वालो के स्वास्थ्य के लिए घातक तो है ही, इसका प्रयोग कानून की दृष्टि मे एक अपराध भी है ।

चीनी और कच्चे माल का समन्वय 

चाशनी को जमाकर तैयार की गई मिश्री मुँह _में उस गति से नहीं घुलती जिस गति से ये खट्टीमीठी गोलियां घुलती हैँ । यही नहीं, सामान्य शर्बत तक कुछ समय रखा रहने पर बोतल के तल में चाशनी के कण जम जाते हैँ, परन्तु ये गोलियां रखे रहने पर बोतल के तल में जमने वाली चीनी जितनी कठोर नहीं हो पातीं । इसका एकमात्र कारण है इनकी चाशनी का निर्माण करते समय वांछित मात्रा में किसी दानामार रसायन का प्रयोग । इन दानामार रसायनों को इस उद्योग में डॉक्टर कहा जाता है । चिकनाई और गलूकोज भी दानामार का कार्य करते हैँ और चॉकलेट आदि में ग्लूकोज़ का ही प्रयोग होता है। परन्तु इन गोलियों की चाशनी में दानामार  के रूप मे प्राय: सीट्रिक एसिड अथवा टारट्रिक एसिड ही मिलाया जाता है । सन्तरे और नीबू के स्वाद एवं सुगंध वाली गोलियों में तो आप सीट्रिक एसिड ही मीलाइए क्योंकि यह अत्यन्त खट्टा होता है । सीट्रिक एसिड से कुछ ही कम खट्टा होता है टारट्रिक एसिड और यही कारण है फि अनार जैसे कम खट्टे फलो की सुगंध के साथ प्रयोग करने के लिए अत्यन्त उत्तम रहता है । जहाँ तक क्रीम आफ़ टारटर का प्रश्न है यह खट्टी तो होती है परन्तु इन दोनों एसिडों की अपेक्षा काफी कम । यही कारण है कि फूलों की सुगन्थ वाली कम खट्टी गोलियों और दुग्ध पाउडर मिश्रित सस्ती कठोर टांफियों में भी इसका प्रयोग किया जाता है, परन्तु खटूटी-मीठी गोलियाँ बनाने के लिए यह अधिक उपयोगी नहीं ।

रंग और सुगन्ध का महत्व 

इन गोलियों की आकृति, रंग और स्वाद कुछ _भी क्यों न हो, किसी विशिष्ट गुब्वर्तिर्द्धक्र और स्वाद प्रदायक रचक का प्रयोग प्राय: नहीं होता । स्वाद का आधार तो डॉक्टर फे रूप में
प्रयुक्त साइट्रिक एसिड या टारटेरिक एसिड होता है और चमक का आधार प्रयोग किए जाने वाला रंग । परन्तु ग्राहक की तृप्ति, आपके लागत मूल्य और इनके बिक्री मूल्य में इन सभी से महत्वपूर्ण भूमिका निबाहती है वह सुगन्ध जिसका आप प्रयोग कर रहे हैँ । यदि इनमें फलों की सुगन्ध साथ-साथ उसका कुछ स्वाद भी हो तो उपभोक्ता को अधिक आनन्द आएगा । इसके विपरीत केवल सुगन्ध होने पर उसका काम तो चल जाएगा परन्तु मजा नहीं आएगा । यही कारण है कि स्तरीय निर्माता इन गोलियों में सुगंध के रूप में कृत्रिम सुगंध-मिश्रणों का नहीं, फलों और फूलों के एसेन्स का प्रयोग करते हैं । उदाहरण के लिए सन्तरे की गोलियों में सन्तरे के छिलकों से निकाला हुआ तेल अथवा एसेन्स डाला जाता है तो अन्य फलों के स्वाद एवं सुगन्थ के लिए उस फल का एसेन्स । यह सत्य है कि कृत्रिम सुगन्ध की अपेक्षा शुद्ध एसेनसो का प्रयोग कई गुना महंगा पड़ता है, क्योकि असेंसो की सुगन्ध मन्द होने के कारण सुगन्ध-मीश्रणों से कई गुनी मात्रा में इन्हें मिलाना पड़ता है । परन्तु एसेन्स द्वारा सुगंधित गोलियाँ-उस फ़ल का स्वादयुक्त होने के कारण-सामान्य से डेढ़-दो गुने मूल्य पर आसानी से बिक जाती हैँ जबकि कुल उत्पादन व्यय में पन्द्रह-बीस प्रतिशत से अधिक का अन्तर नही पड़ता ।
यह एक ऐसा अदूभुद उद्योग है जिसमेँ महंगे पैकेजिंग और प्रचार का आज भी कोई महत्व नहीं । इसी प्रकार आपके उत्पादों की बिक्री दर भी आपके प्लाण्ट और पूंजी निवेश से नहीं बल्कि ग्राहक को मिलने वाले उस आनन्द पर निर्भर करती है जो वांछित चमकदार रंग, मनभावन सुगन्ध और मधुर स्वाद के आभास द्वारा आप उसे दे पाते हैं । कम मात्रा में अच्छे स्वाद और सुगन्ध वाली ये गोलियां बनाने वाले पूंजीबिहीन व्यक्ति भी इस लाइन में चन्द वषों में ही नाम और दाम दोनों ही पर्याप्त मात्रा में अर्जित कर लेते हैँ । दूसरी तरफ बडे स्तर पर भी जो व्यक्ति सस्ती सुगन्ध मिलाकर काम चलाऊ ड्रॉप्स और लॉलीपॉप आदि बनाते हैँ वे जीवन भर सस्ती कनफेक्शनरी बनाने वाले गुमनाम निर्माता ही बने रहते हैँ । परन्तु जो व्यक्ति इन पर छिड़कने के लिए मक्का के स्टार्च के  स्थान पर सेलम अर्थात सोप स्टोन और सस्ते रंगों का प्रयोग करते हैँ, वे बालकों के स्वास्थ्य से तो खिलवाड़ करते ही हैं, कभी-ऩ-कभी कानून की पकड मे भी आ हो जाते हैं ।




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