How to make Guar Gum in Hindi? Guar Gum Production Process.

ग्वार गम कैसे बनता है। ग्वार गम उत्पादन प्रक्रिया


यद्यपि ग्वार गम कोई खाद्य पदार्थ नहीं, फिर भी एग्रो इण्डरट्रीज मे एक बहुत ही शानदार और तीव्रतम गति से विकासमान उद्योग है । कुछ दशक पूर्व तक जिन उद्योगों में अरारोट तथा आलू और चावल के स्टार्चों का प्रयोग होता था, आज उन सभी कार्यों के लिए ग्वार गम का प्रयोग होता है । ग्वार गम वास्तव में कोई गोंद नहीं, ग्वार नामक अनाज का स्टार्च ही है, परन्तु बहुत अधिक चिपक प्रदायक क्षमता होने के कारण ही इसे ग्वार का गम कहा जाता है । इसका सबसे अघिक मात्रा में प्रयोग तो कागज और सूती कपडों के निर्माण  मेँ होता है । कागज निर्माण में इसकी प्रमुख उपयोगिता लुगदी अर्थात पल्प को गाढा बनाना तथा तैयार होने वाले कागज की सतह को एकसार, चिकना तथा धवल श्वेत बनाना है । सूती कपडों और धागों पर इसकी लेहि बनाकर क्लफ़ के रूप में चढाई जाती है । यह इन दोनों उद्योर्गों के लिए तो बहुत अधिक मात्रा मे लगने वाला आधारभूत कच्चा माल है ही, एडहेसिवों, आइस क्रीम तथा अनेक सौन्दर्य-प्रसाधनों और दवाइयों के निर्माण में भी इसका प्रयोग होता है । सबसे बडी बात तो यह है कि जितने ग्वार गम की खपत हमारे देश में होती है, उससे भी अधिक मात्रा मेँ यह विदेशों को निर्यात किया जाता है । योरोप और अमरीका महाद्वीप के विभिन्न देशों के उद्योग हमारे यहाँ निर्मित ग्वार गम को अधिक दर पर खरीदने के लिए तत्पर रहते हैं, क्योंकि हमारे यहाँ की साधारण देशी ग्वार का गम वहाँ उत्पन्न होने वाले ग्वार के स्टार्च से अधिक गाढा घोल बनाने में समर्थ है । यही कारण है कि तीन-चार मास के उत्पादन व्यय जितनी कार्यकारी पूंजी होने पर आप इसे विदेशों को आसानी से निर्यात कर सकते हैं ।

 ग्वार का चयन तथा तेजाब 

ग्वार गम उद्योग का एकमात्र कच्चा माल ग्वार नामक अनाज तथा सहायक रसायन गंधक का तेजाब है । पानी के अतिरिक्त अन्य किसी रसायन अथवा रचक की रंचमात्र मी आवश्यक्ता नहीं । ग्वार एक सस्ता और अखाद्य अनाज है, जो पशुओं को खिलाने के अतिरिक्त अन्य किसी भी काम नहीं आता । सिंचाई सुविधा से रहित घटिया भूमि में भी ग्वार आसानी से उग जाती है । यही कारण है कि राजस्थान में तो इसकी खेती बड़े पैमाने पर होतो ही है, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में भी काफी उगाई जा रही है । हमारे देश में उत्पन्न होने वाली यह देशी ग्वार गम बनाने की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ क्यालिटी की होती है और अन्य सभी अनाजों से सस्ती भी है । बस ग्वार खरीदते समय एक बात का ध्यान रखें कि वह घुनी हुई, अधिक पुरानी अथवा आधे-अधूरे रूप में विकसित न हो । ग्वार के पूरी तरह स्वस्थ और विकसित दानों से ही अच्छा ग्वार गम तैयार होता है, जबकि अधूरे रूप में विकसित दानो में स्टार्च की मात्रा बहुत कम होती है, तो किसी अनाज के घुनते समय भी सबसे पहले यह मध्यवर्ती मुलायम तत्व ही कीडों द्वारा खाया जाता है ।

गंधक का तेजाब भी ग्वार के समान ही अत्यन्त सस्ता और सर्वसुलभ रसायन है । इसका घनत्व इतना अधिक है, कि दस लीटर शुद्ध गंधक के तेजाब का भार अठारह  किलोग्राम होता है । अत्यन्त दाहक होता है यह तेजाब, और अधिकांश धातुओं को काट देता है । यही कारण है कि कांच अथवा मिट्टी के जारों या प्लास्टिक की मजबूत कैनों में ही इसे रखा जा सकता है । गंधक का तेजाब अर्थात सल्फ्यूरिक एसिड शरीर पर पड़ते ही जलाकर गहरे घाव तो कर ही देता है, इसकी गैस भी स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद होती है । यही कारण है कि परिवहन, स्टोर में रखते और प्रयोग करते समय इस बारे में विशेष सावधानी आवश्यक ही नही अनिवार्य है ।

मशीने, उपकरण तथा पूंजी निवेश 

 ग्वार को पीसकर नही बल्कि पहले उसको दरदरा तोडकर और फिर इसके मुलायम तत्व एण्डोस्पर्म अर्थात स्टार्च को काजल के समान फाइन पाउडर के रूप मेँ पीसकर ग्वार गम तैयार किया जाता है । छोटे और मध्यम स्तर पर इस कार्य को करने के लिए मशीन के नाम पर मात्र एक पल्वीलाइजर और एक रोलर मिल चाहिए जो माप और क्षमता के अनुरूप दो से सात लाख रुपए के मध्य सेट हो जाते हैँ । इसके साथ ही धुली ग्वार को सुखाने के लिए बड़े हॉल के रूप में ड्राइंग चेम्बर तैयार कराना पड़ता है । साधारण पक्के फर्श और कम ऊँचाई के इस हाल में गर्म हवा प्रवाहित करने के लिए कुछ हीटर और पंखे लगाए जाते हैँ । इसके साथ ही एक श्रृंखला में ईंटों औेर सीमेण्ट की तीन टंकियाँ भी -बनवानी पड़ती हैँ । इनमें बीच वाली टंकी तो ऊँचाई पर सेट की जाती है और दोनों ओर की टंकियां उसके तल से भी नीची रहती हैँ । इसके साथ ही ग्वार रखने हेतु सामान्य गोदाम और ग्वार गम पैक करने और रखने हेतु स्थान भी चाहिए! पांच सौ से एक हजार वर्ग मीटर स्थान इस कार्य के लिए पर्याप्त रहता है और जो भी लागत आती है वह मुख्य रूप से स्टोर रूम, कार्यस्थल, सुखाने के कमरे और टैंकों के निर्माण पर ही आती है । पॉच टन ग्वार का गम प्रति शिफ्ट तैयार करने हेतु पल्वीलाइजर और अन्य उपकरण तो पांच-छह लाख रुपए में ही आ जाते हैं, जबकि बडा प्लाण्ट लगाने पर भी इसकी लागत में अधिक वृद्धि नहीं होती ।
जहां तक स्वचलित प्लाण्ट लगाकर बहुत बड़े पैमाने पर उत्पादन का प्रश्न है, ग्वार को साफ करने के लिए यूरेका और कार्टरडिरेक सेपरेटर तथा डिकी शिफ्टर तथा blocking machine लेने पर ग्वार को साफ़ करने से टैंक में पहुंचाने तक का सारा कार्य स्वयं होता रहता है । लगभग 15 लाख रुपए में ये चारों उपकरण सेट हो जाते हैं । दस टन ग्वार प्रति शिफ्ट साफ करके टैंक तक पहुंचाने के लिए सामान्य रूप से तीस श्रमिक चाहिए तो ये मशीनें लगा लेने पर तीन श्रमिक ही सारा कार्य कर लेते हैँ । परन्तु प्लाण्ट की कुल लागत से भी कई गुना अधिक धन आपकी कार्यकारी पूंजी के रूप में चाहिए, क्योंकि ग्वार को फसल के समय इकट्ठा खरीदकर रखने पर लाभ की मात्रा स्वत: ही काफी अधिक बढ़ जाती है ।

चरणबद्ध प्रक्रिया 

ब्रेडों के निर्माण के समान ही ग्वार गम तैयार करना भी बहुत ही आसान कार्य है और एक चरणबद्ध प्रक्रिया के रूप में निरन्तर होता रहता है यह कार्य । ग्वार को सामान्य रूप से छानने और कंकर तथा मिट्टी अलग करने के बाद इसका छिलका उतारा जाता है । प्राय: इस कार्य को हाथों से ही करते हैं । कुछ बड़े-बड़े छनने को रस्सियों की सहायता से लटकाकर उनमें धार डालकर हिलाने से ही साफ हो जाती है, क्योंकि मिट्टी और कंकर-पत्थर हटाना तो अनिवार्य है, परन्तु तिनके धुलाई में स्वयं बह जाते हैँ ।

छिलका उतारना व सुखाना 

 सबसे पहले ग्वार के छिलके उतारने तथा इसमें निहित नाममात्र के वसा तत्व को दूर करने का कार्य किया जाता हे । प्राय: ही एक बार मे आधा टन ग्वार पर यह प्रक्रिया की जाती
है । इस प्रयोजन के लिए बनवाए जाने वालो टैंको या हौजों में मध्यवर्ती ऊँचे प्लेट फार्म पर बनाए जाने वाला हौज बारह सौं लीटर क्षमता का बनवाया जाता है । एक ओर का नीचे वाला हौज लगभग एक हजार लीटर क्षमता का बनवाते हैँ तो दूसरा हौज इससे आधे माप का । छोटे हौज में पहले दो सौ लीटर ताजा पानी डालकर ढाई सौ लीटर गंधक का तेजाब मिलाकर इसकी क्षमता पचपन प्रतिशत कर ली जाती है । बीच के टैंक में 5 कुंटल ग्वार डालने के बाद उसमे साढे चार सौ लीटर तेजाब और पानी का यह मिश्रण डाल देते हैं । इस कार्य के लिए प्राय: ही एक पम्प का प्रयोग करते हैँ । लगभग पन्द्रह मिनट तक ग्वार को तेजाब के घोल में पडी रखने के बाद इसमे लगे हेवी डूयूटी मिक्सर को अत्यन्त मन्द गति पर चलाया जाता है । इसे चलाने का अभिप्राय घुटाई अथवा पिसाई नहीं, ग्वार को इतना हिलाना-चलाना मात्र है कि वह तेजाब मिश्रित पानी मे समान रूप से भीगती रहे । लगभग चालीस-पैंतालीस मिनट तक इस ग्वार को इस टैंक में रखा जाता है । इतने समय में ग्वार का छिलका अच्छी प्रकार से फूल जाता है और ग्वार में जो थोड़ा बहुत वसा तत्व होता है वह भी दानों से निकलकर तेजाब के घोल में मिल जाता है ।

गंधक का तेजाब धातुओं और कंकरीट को काट देता है, अत: मध्यवर्ती और साइड के छोटे टैंक पर प्लास्टिक या रबर की लाइनिंग भी की जाती है और पम्प भी प्लास्टिक अथवा स्टेनलेस स्टील का लगाया जाता है । ग्वार के फूल जाने पर टैंक के तल में लगे नलके को खोलकर छोटे टैंक में पहले तेजाब और पानी को ले जाते हैँ । प्लीजिंग टैंक से सम्पूर्ण तेजाब मिश्रित पानी निकालने के बाद दूसरे मोटे पाइप द्वारा संपूर्ण ग्वार को दूसरे टैंक में ले जाते हैँ । इस टैंक मे पहले से ही पर्याप्त पानी भर दिया जाता है । ऊपर तैर रहे छिलकों को हटाकर और पानी बदलकर इसमें लगे मिक्सर को कुछ समय  चलाते हैँ जिससे सभी दानों से छिलका उत्तर जाए । ग्वार को अच्छी तरह से धोने और इसका पानी टपकाने के बाद ड्राइंग चेम्बर में डालकर दोनों को पूरी तरह सुखा लिया जाता हे । तीव्र तापमान पर एक घण्टे से भी कम समय में ग्वार को सुखा लेना आवश्यक है, वरना ग्वार गम की क्वालिटी में न्यूनाधिक कमी आ ही जाएगी । जहाँ तक छोटे टैंक में निकाले गए तेजाब मिश्रित पानी का प्रश्न है उसमे अपेक्षित मात्रा में तेजाब मिलाकर पुन: उसकी शक्ति पचपन प्रतिशत कर ली जाती है। इस प्रकार तेजाब का यह घोल बारम्बार प्रयोग होता रहता है । तेजाब के घोल की यह शक्ति सौ-डेढ़ सौ रुपए मेँ आने वाले वामी मीटर नामक काँच के छोटे से उपकरण द्वारा नापी जाती है ।

एण्डोस्पर्म तथा बीजाणु अलग करना 

मक्का, ज्वार, गेहूँ आदि अनाजों में छिलके के नीचे अलग-अलग दो तत्व प्रोटीन तथा स्टार्च होते हैँ । बारीक पीसने पर तो गेहूँ के आटे के समान ये दोनों तत्व इस प्रकार मिल जाते ,हैं कि उन्हे अलग नहीं किया जा सकता । इनमें से कठोर तत्व को तो बीजाणु कहा जाता है जो वास्तव में अनाज का प्रोटीन और अन्य तत्वों का मिश्रण है । मुलायम तत्व को एण्डोस्पर्म  कहा जाता है जो कि वास्तव में स्टार्च है । ग्वार के इसी एंडोस्पर्म या स्टार्च को ग्वार गम कहा जाता है । इसके लिए रोलर मिल अथवा हैमर मिल में ग्वार के सूखे दानों को दरदरा पीसा जाता है । इस प्रक्रिया में प्रोटीन तत्व मोटा रहता है, परन्तु स्टार्च मुलायम होने कै कारण काफी बारीक होता है । कई छलनियों में छानकर बीजाणु और एण्डोस्पर्म को अलग-अलग कर लिया जाता है ।

फाइनल पिसाई तथा पैकिंग

ग्वार को एण्डोस्पर्म कहा जाए अथवा ग्वार गम, है तो यह वास्तव में ग्वार का स्टार्च ही । इसे चक्की पर पीसने के बजाय पल्वीलाइजर में काजल के समान एकदम फाइन पाउडर के रूप में पीसा जाता है । इसे प्राय: ही बोरों में पैक करते हैं, परन्तु सामान्य बोरों के स्थान पर पोलीथीन के मोटा अस्तर लगी बोरियों में पैक करते हैं, जिससे नमी अपना प्रभाव न डाल सके । जरा-सी भी नमी लगते ही इसमें गुठलियां पड़ जाती हैं और यह बेकार हो जाता है, अत: पैकिंग का पूरी तरह एअरटाइट होना अनिवार्य है । सबसे अच्छा तो इसे निर्यात करना अथवा कागज और कपड़ा मिलों को सीधे सप्लाई करना ही रहता है, वैसे छोटे पैकिंग में थोड़ा-बहुत माल विक्रेताओं के यहां भी बेचने के लिए रखा जा सकता है।
आप प्रतिदिन जितना ग्वार गम तैयार करते हैँ, उससे भी कई गुना प्रोटीन तत्व आपके यहाँ दरदरे पाउडर के रूप में निकलता है । पशुओं के लिए यह बहुत ही अधिक पौष्टिक और शक्ति-वर्धक खाद्य पदार्थ है । मुर्गीदाना तथा पौष्टिक और दुग्धवर्द्धक पशुचारा बनाने वाले संस्थान तथा पशु-पालक इसे लगभग ग्वार की ही दर पर खरीद लेते हैँ । वास्तविकता तो यह है कि इस उद्योग में संचालक को केवल ग्वार की खरीद और ग्वार गम तथा इन बीजाणुओं की बिक्री व्यवस्था पऱ ही ध्यान देना पडता है, ब्रेड़ों के स्वचलित प्लाण्ट के समान ही उत्पादन का सम्पूर्ण कार्य तो सामान्य श्रमिक ही कर लेते हें ।


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